चैत्र नवरात्रि 2022: आज से शुरू हो रही है चैत्र नवरात्रि, जानिए घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

Chaitra Navratri 2022 Puja Vidhi And Muhurat Mantra: चैत्र नवरात्रि 02 अप्रैल, शनिवार से शुरू होकर 11 अप्रैल, रविवार तक चलेगी। देशभर में इस दौरान नवरात्र के 9 दिनों में देवी मां के 9 रूपों की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि (Navratri) में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा करने से विशेष कृपा मिलती है। इस दौरान लगभग हर नवरात्रि करने वालों के घर में घटस्थापना या कलश की स्थापना की जाती है। इस बार नवरात्रि घटस्थापना का मुहूर्त 2 अप्रैल 2022 शनिवार सुबह 06.03 बजे से 08.31 बजे तक रहेगा। यदि आप इस मुहूर्त में कलश की स्थापना नहीं कर पा रहे हैं तो अभिजित काल में 11:48 से 12:37 तक कलश की स्थापना कर सकते हैं।

चैत्र नवरात्रि पर घोड़े पर माता का आगमन

इस नवरात्रि (Navratri) में घरों में माता का आगमन घोड़े पर हो रहा है। नवरात्रि (Navratri)  में जब भी मां घोड़े पर आती हैं तो समाज में अस्थिरता, तनाव, अचानक बड़ी दुर्घटना, भूकंप, चक्रवात आदि के कारण तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। आम लोगों के सुखों में कमी का अहसास होता है। इसलिए इस नवरात्रि में क्षमा प्रार्थना के साथ मां की पूजा करना नितांत आवश्यक है और प्रतिदिन विधिवत पूजा करने के बाद क्षमा प्रार्थना करना भी अत्यंत आवश्यक होगा। इससे लाभ होगा।

नवरात्रि पूजा विधि

नवरात्रि (Navratri) के प्रथम दिन घर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वास्तिक बनाएं और दरवाजे पर आम के पत्तों का तोरण लगाएं। क्योंकि इस दिन भक्तों के घर मां का आगमन होता है। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं और आपके घर में वास करती हैं। नवरात्रि में माता की मूर्ति को लकड़ी की चौकी या आसन पर स्थापित करना चाहिए। जहां मूर्ति या चित्र स्थापित हो वहां सबसे पहले स्वस्तिक का चिन्ह बना लें। उसके बाद रोली और अक्षत से टीका और फिर वहां मां की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद विधि विधान से माता की पूजा करें।

वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा यानी उत्तर पूर्व को पूजा के लिए सबसे अच्छा स्थान माना जाता है। अगर आप भी हर साल कलश स्थापना करते हैं तो इस दिशा में आपका कलश रखना चाहिए और माता की चौकी को सजाना चाहिए। शास्त्रों में कलश पर नारियल रखने के बारे में बताया गया है कि “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय, ऊर्धवस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय,तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीलेलंष्।” मतलब कलश पर नारियल रखते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नारियल का मुंह नीचे की ओर न हो। नारियल का मुख नीचे होने पर शत्रु बढ़ जाते हैं। जब नारियल को खड़ा रखा जाता है और उसका मुख ऊपर की ओर होता है तो रोग बढ़ जाता है मतलब घर में रहने वाले लोग ज्यादा बीमार होते हैं। कलश पर नारियल रखते वक्त यदि नारियल का मुख पूर्व दिशा की ओर हो तो आर्थिक हानि होती है अर्थात धन हानि का योग बनता रहता है, लेकिन कलश स्थापना का यह उद्देश्य तब ही सफल होता है जब कलश पर रखा हुआ नारियल का मुख पूजन करने वाले व्यक्ति की तरफ हो।

नौ दिनों में करें मां के नौ रूपों की पूजा

नवरात्रि की शुरुआत नवरात्रि के पहले दिन कलश यानी घटस्थापना के साथ होती है। पहले दिन मां शैलपुत्री की और दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कुष्मांडा और पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। छठे दिन मां कात्यायनी और सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है और नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

शुद्ध पवित्र आसन पर बैठकर रुद्राक्ष या चंदन की माला से ऊं दुं दुर्गाये नमः पांच या कम से कम एक माला मंत्र का जाप करके मनोरथ निवेदित करें। पूरे नवरात्रि में प्रतिदिन जप करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कई बार ऐसा होता है कि विधि विधान से पूजा करने के बाद भी मनचाहा फल नहीं मिलता है। भक्तों को यह ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गा पूजा में दूर्वा, तुलसी, आंवला, आक और मदार के फूल नहीं चढ़ाएं। लाल फूलों और रंगों का अधिक प्रयोग करें।

मां दुर्गा की पूजा केवल सूखे कपड़े पहनकर करनी चाहिए, गीले कपड़े पहनकर नहीं। अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं खुले बालों से पूजा करती हैं, जो कि वर्जित है। विशेष रूप से दुर्गा पूजा या नवरात्रि के दौरान हवन पूजा और जप के दौरान उन्हें अपने बाल खुले नहीं रखने चाहिए।

दुर्गा सप्तशती की महिमा

सप्तशती में कुछ ऐसे स्तोत्र और मंत्र हैं, जिनका विधिवत पाठ करने से मनचाहा फल मिलता है।

सर्वकल्याण हेतु

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।

बाधा मुक्ति और धन-पुत्रादि हेतु

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय।।

आरोग्य एवं सौभाग्य हेतु

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजही।।

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